बोधकथा (एकजुटता की शक्ति)
एक बार सरदार वल्लभभाई पटेल गुजरात के बारडोली क्षेत्र के एक गाँव में आए थे। उस गाँव के लोगों ने उनसे कहा, “हमारे गाँव में डाकुओं ने बहुत परेशानी पैदा कर रखी है। उनकी भय से हमें बचाने का कोई उपाय बताइए।” गाँव वालों की बात सुनकर सरदार ने पूछा, “तुम्हारे गाँव में कुल कितने लोग हैं?” गाँव के मुखिया ने कहा, “लगभग सात सौ।” इस पर पटेल बोले, “सात सौ लोगों में कम-से-कम दो सौ तो युवा और मजबूत होंगे। तुम्हारी संख्या उनसे कहीं अधिक है। तुम सब एकजुट होकर और साहस के साथ उनका सामना करो। जब उन्हें तुम्हारे गाँव की एकता का एहसास होगा, तब वे तुम्हारी ओर मुड़कर भी नहीं देखेंगे।”
सरदार पटेल के ये शब्द सुनकर गाँव वालों में नया उत्साह जाग उठा। अगली बार जब डाकू आए, तो सभी गाँव वाले एकजुट होकर उनका सामना करने के लिए खड़े हो गए। गाँव वालों में आए इस अचानक परिवर्तन को देखकर डाकू डर गए।
Bodh Katha (बोध कथा)
Tuesday, June 9, 2026
Thursday, May 7, 2026
बोधकथा (काँच का जार )
बोधकथा (काँच का जार )
एक बार की बात है, एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों के सामने एक खाली काँच का जार क्लास में आए । प्रोफेसर ने सबसे पहले बड़े पत्थर उठाए खाली जार में डालने लगे। थोड़ी देर में जार ऊपर तक भर गया। उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा — “क्या अब यह जार भर गया है?” सभी विद्यार्थियों ने एक स्वर में कहा — “जी सर, अब यह पूरा भर गया है।” फिर शिक्षक ने जार में कंकड़ डालने शुरू किए फिर शिक्षक ने बालू को जार में डाला । फिर उन्होंने पास रखा एक गिलास पानी उठाया और उसे भी जार में डाल दिया । शिक्षक ने कहा — “यह जार आपके जीवन का प्रतीक है। इसमें जो बड़े पत्थर हैं, वे आपके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण चीज़ें हैं — आपका परिवार, स्वास्थ्य, चरित्र । कंकड़ आपके करियर, नौकरी, भौतिक जरूरतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। और बालू (रेत) उन छोटी-छोटी चीज़ों का प्रतीक है — जैसे मनोरंजन, सोशल मीडिया, दूसरों से तुलना, या छोटी चिंताएँ।” उन्होंने आगे कहा — “अगर तुम सबसे पहले बालू जार में भर दोगे, तो पत्थरों और कंकड़ों के लिए जगह नहीं बचेगी।
“और जहाँ तक पानी का सवाल है — यह दर्शाता है कि चाहे आपका जीवन कितना भी व्यस्त क्यों न हो, हमेशा एक कप चाय या कॉफी अपने दोस्तों के साथ पीने का समय निकालना चाहिए।”
Saturday, March 28, 2026
बोधकथा (मूर्तिकार की साधना)
बोधकथा (मूर्तिकार की साधना)
एक आदमी एक निर्माणाधीन मंदिर को देखने गया। तभी उसने देखा कि एक मूर्तिकार भगवान की एक जैसी दो मूर्ति बना रहा है। वह उसके पास गया और पूछा, “क्या तुम एक जैसी दो मूर्तियाँ बना रहे हो?” मूर्तिकार ने कहा, “नहीं।” “हमें एक ही मूर्ति चाहिए, पर पहली मूर्ति बनाते वक्त थोड़ी खराब हो गयी।” उस आदमी ने मूर्ति को उठाया और जांचने लगा। पर उसे कोई भी खराबी नजर नहीं आई। “कहाँ से खराब हो गयी है ये? यह कहाँ सामने लगने वाली है क्या?” मूर्तिकार ने कहा - “नहीं, ये तो मंदिर के बाहर 20 फीट ऊँचे खम्बे पर लगाने के लिए बनायी गयी हैं।” “अगर ये मूर्ति इतनी ऊपर लगने वाली है तो भला इतनी छोटी सी गलती को कोई कैसे देख लेगा? तुम तो पहले वाली मूर्ति को ही रख सकते हो। किसे पता पड़ेगा?” इस पर मूर्तिकार ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुरा कर कहा, “मुझे तो पता होगा ही और भगवान को भी पता होगा!”
Monday, March 9, 2026
बोधकथा(संपूर्ण सुंदरता)
बोधकथा(संपूर्ण सुंदरता)
एक बार प्रकृति के सातों रंगों के बीच बहस छिड़ गई। प्रत्येक रंग यह साबित करने में लगा था कि वही सब से श्रेष्ठ है। सबसे पहले हरे रंग ने कहा कि वह जीवन और हरियाली का प्रतीक है, नीले रंग ने कहा, ‘आकाश व समुद का रंग नीला है। जल ही जीवन है। इसलिए मैं तुम सबसे श्रेष्ठ हूं।’ पीला रंग बोला, ‘पीला खुशहाली का प्रतीक है। सूरज पीला है, इसलिए मैं ही सर्वश्रेष्ठ स्थान का अधिकारी हूं।’ तभी नारंगी रंग ने कहा, ‘मैं मिठास और स्वास्थ्य का प्रतीक हूं। सभी मीठे व लाभकारी फलों जैसे पपीता, आम आदि की छटा नारंगी है।’ तभी जामुनी रंग ने कहा, ‘श्रेष्ठ तो मैं हूं क्योंकि मैं पानी की गहराई व मन की शांति का प्रतीक हूं।’ वर्षा ऋतु रंगों की इस सारी बहस को ध्यान से सुन रही थी। वह पास आकर बोली, ‘तुम सभी श्रेष्ठ हो। सभी को ईश्वर ने किसी न किसी खास कारण से बनाया है। लेकिन सर्वश्रेष्ठ है तुम सबका एक साथ होना। तभी आकाश में जोर से बिजली कड़की। सभी रंगों ने डर कर एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और आकाश में बड़ा-सा इंद्रधनुष दिखाई देने लगा। रंगों ने देखा, सभी उनकी छटा निहार रहे थे। इसके बाद रंगों ने कभी एक-दूसरे से झगड़ा नहीं किया।
एक बार प्रकृति के सातों रंगों के बीच बहस छिड़ गई। प्रत्येक रंग यह साबित करने में लगा था कि वही सब से श्रेष्ठ है। सबसे पहले हरे रंग ने कहा कि वह जीवन और हरियाली का प्रतीक है, नीले रंग ने कहा, ‘आकाश व समुद का रंग नीला है। जल ही जीवन है। इसलिए मैं तुम सबसे श्रेष्ठ हूं।’ पीला रंग बोला, ‘पीला खुशहाली का प्रतीक है। सूरज पीला है, इसलिए मैं ही सर्वश्रेष्ठ स्थान का अधिकारी हूं।’ तभी नारंगी रंग ने कहा, ‘मैं मिठास और स्वास्थ्य का प्रतीक हूं। सभी मीठे व लाभकारी फलों जैसे पपीता, आम आदि की छटा नारंगी है।’ तभी जामुनी रंग ने कहा, ‘श्रेष्ठ तो मैं हूं क्योंकि मैं पानी की गहराई व मन की शांति का प्रतीक हूं।’ वर्षा ऋतु रंगों की इस सारी बहस को ध्यान से सुन रही थी। वह पास आकर बोली, ‘तुम सभी श्रेष्ठ हो। सभी को ईश्वर ने किसी न किसी खास कारण से बनाया है। लेकिन सर्वश्रेष्ठ है तुम सबका एक साथ होना। तभी आकाश में जोर से बिजली कड़की। सभी रंगों ने डर कर एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और आकाश में बड़ा-सा इंद्रधनुष दिखाई देने लगा। रंगों ने देखा, सभी उनकी छटा निहार रहे थे। इसके बाद रंगों ने कभी एक-दूसरे से झगड़ा नहीं किया।
बोध कथा (एकता की शक्ति )
बोध कथा (एकता की शक्ति )
एक बार गुजरात के बारदौली जिले के एक गांव के लोगों ने सरदार पटेल से कहा, 'हमारे गांव में डाकुओं ने कहर बरपाया हुआ है। हमें उनके आतंक से बचने का कोई उपाय बताइए।'
ग्रामीणों की बात सुनकर सरदार ने पूछा, 'गांववासियों की संख्या कुल मिलाकर कितनी है?' गांव का मुखिया बोला, 'यही कोई सात सौ।' पटेल बोले, 'सात सौ में कम से कम दो सौ व्यक्ति तो ऐसे होंगे जो जवान व स्वस्थ होंगे। फिर आप लोग घबरा क्यों रहे हैं?
डाकुओं की संख्या कितनी होगी- सात, आठ या ज्यादा से ज्यादा दस। आप लोगों की संख्या उनसे काफी ज्यादा है। आप आपस में एकजुट होकर हिम्मत के साथ उनका मुकाबला कीजिए। जब उन्हें इस गांव की एकता का पता चलेगा तो वे आपकी तरफ झांकेंगे भी नहीं।'
सरदार पटेल की बात सुनकर ग्रामीणों में नया जोश जागा। अगली बार ज्यों ही डाकू आए, सारे ग्रामीण एकजुट होकर उनका मुकाबला करने चले आए। ग्रामीणों में अचानक आए इस बदलाव से डाकू घबरा गए ।
बोध कथा (पेंसिल से सीख)
बोध कथा (पेंसिल से सीख)
पिता ने अपने लड़के से कहा – “मैं उम्मीद करता हूँ तुम भी बड़े होकर पेंसिल कि तरह ही बनोगे '
लड़के ने कहा – “ इसमे क्या खास है ? पिता बोले – “पेंसिल में पांच गुण हैं, जिसे अपना लो तो तुम महान बन जाओगे.' पहला : पेंसिल की तरह आपके भी पीछे एक हाथ होता है जो आपको मार्गदर्शन देता है और उस हाथ को हम ईश्वर कहते है। दूसरा: शार्पनर पेंसिल को थोड़ी देर के लिए तकलीफ पहुचाता है पर इसके बाद वो और ज्यादा अच्छा लिखती है. इसलिए तुम्हें भी दुःख और तकलीफों को सहना करना सीखना चाहिए । तीसरा: पेंसिल रबर द्वारा गलतियों को मिटाने का मौका देती है यानी गलतियाँ हो तो उसको सुधारना भी जरूरी है ।
चौथा: पेंसिल में उसकी लकड़ी से ज्यादा उसके अन्दर कि ग्रेफ़ाइट महत्वपूर्ण है, इसलिए तुम हमेशा ध्यान दो कि तुम्हारे अन्दर क्या भरा है? पांचवां: पेंसिल हमेशा निशान छोड़ जाती है, इसलिए तुम कोई भी काम चाहे वो कितना भी छोटा क्यों न हो बुद्धिमानी और एकाग्रता से करो, जिससे लोग तुम्हें याद रखें ।
पिता ने अपने लड़के से कहा – “मैं उम्मीद करता हूँ तुम भी बड़े होकर पेंसिल कि तरह ही बनोगे '
लड़के ने कहा – “ इसमे क्या खास है ? पिता बोले – “पेंसिल में पांच गुण हैं, जिसे अपना लो तो तुम महान बन जाओगे.' पहला : पेंसिल की तरह आपके भी पीछे एक हाथ होता है जो आपको मार्गदर्शन देता है और उस हाथ को हम ईश्वर कहते है। दूसरा: शार्पनर पेंसिल को थोड़ी देर के लिए तकलीफ पहुचाता है पर इसके बाद वो और ज्यादा अच्छा लिखती है. इसलिए तुम्हें भी दुःख और तकलीफों को सहना करना सीखना चाहिए । तीसरा: पेंसिल रबर द्वारा गलतियों को मिटाने का मौका देती है यानी गलतियाँ हो तो उसको सुधारना भी जरूरी है ।
चौथा: पेंसिल में उसकी लकड़ी से ज्यादा उसके अन्दर कि ग्रेफ़ाइट महत्वपूर्ण है, इसलिए तुम हमेशा ध्यान दो कि तुम्हारे अन्दर क्या भरा है? पांचवां: पेंसिल हमेशा निशान छोड़ जाती है, इसलिए तुम कोई भी काम चाहे वो कितना भी छोटा क्यों न हो बुद्धिमानी और एकाग्रता से करो, जिससे लोग तुम्हें याद रखें ।
बोध कथा (परनिंदा)
बोध कथा (परनिंदा)
स्वामी सेवानंदजी के दो शिष्य थे – रामानंद और चेतनानंद । एक दिन रामानंद देर तक सोया रहा । ऐसा 3 – 4 दिन तक होता रहा । आखिर चेतनानंद गुरुजी के पास पहुँचा और कहा - ‘‘गुरुदेव ! रामानंद आजकल देर तक सोता रहता है ।” गुरुजी बोले : ‘‘अच्छा होता अगर तू भी सोया ही रहता । चेतनानंद ने आश्चर्य से कहा - ‘‘ऐसा क्यों गुरुजी ? मेरे सोने से किसको लाभ होगा ? गुरु जी ने कहा - ‘‘तुमको ही लाभ होगा । तुम परनिंदा से बचे रहोगे ।” तब चेतनानंद ने तुरंत अपनी सफाई में कहा : ‘‘मैं निंदा नहीं कर रहा हूँ गुरुजी ! मैं तो उसकी गलती बता रहा हूँ जिससे वह सुधर जाय ! गुरुजी ने कहा – तुम उससे देर तक सोने का कारण पूछते। उसे समझाते । अगर वह फिर भी नहीं मानता तब यह बात उसके सामने मुझसे बोलनी चाहिए थी ।“ उसने गुरुदेव से हृदयपूर्वक क्षमा माँगी ।
स्वामी सेवानंदजी के दो शिष्य थे – रामानंद और चेतनानंद । एक दिन रामानंद देर तक सोया रहा । ऐसा 3 – 4 दिन तक होता रहा । आखिर चेतनानंद गुरुजी के पास पहुँचा और कहा - ‘‘गुरुदेव ! रामानंद आजकल देर तक सोता रहता है ।” गुरुजी बोले : ‘‘अच्छा होता अगर तू भी सोया ही रहता । चेतनानंद ने आश्चर्य से कहा - ‘‘ऐसा क्यों गुरुजी ? मेरे सोने से किसको लाभ होगा ? गुरु जी ने कहा - ‘‘तुमको ही लाभ होगा । तुम परनिंदा से बचे रहोगे ।” तब चेतनानंद ने तुरंत अपनी सफाई में कहा : ‘‘मैं निंदा नहीं कर रहा हूँ गुरुजी ! मैं तो उसकी गलती बता रहा हूँ जिससे वह सुधर जाय ! गुरुजी ने कहा – तुम उससे देर तक सोने का कारण पूछते। उसे समझाते । अगर वह फिर भी नहीं मानता तब यह बात उसके सामने मुझसे बोलनी चाहिए थी ।“ उसने गुरुदेव से हृदयपूर्वक क्षमा माँगी ।
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बोधकथा (एकजुटता की शक्ति)
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बोध कथा (प्रतिभा की चमक) ऋषि अंगिरा के शिष्यों में एक था उदयन। वह काफी प्रतिभाशाली था पर उसमें विनम्रता की कमी थी , ऋषि ने सोचा कि समय रहते...