Monday, March 9, 2026

बोधकथा(संपूर्ण सुंदरता)

बोधकथा(संपूर्ण सुंदरता)
एक बार प्रकृति के सातों रंगों के बीच बहस छिड़ गई। प्रत्येक रंग यह साबित करने में लगा था कि वही सब से श्रेष्ठ है। सबसे पहले हरे रंग ने कहा कि वह जीवन और हरियाली का प्रतीक है, नीले रंग ने कहा, ‘आकाश व समुद का रंग नीला है। जल ही जीवन है। इसलिए मैं तुम सबसे श्रेष्ठ हूं।’ पीला रंग बोला, ‘पीला खुशहाली का प्रतीक है। सूरज पीला है, इसलिए मैं ही सर्वश्रेष्ठ स्थान का अधिकारी हूं।’ तभी नारंगी रंग ने कहा, ‘मैं मिठास और स्वास्थ्य का प्रतीक हूं। सभी मीठे व लाभकारी फलों जैसे पपीता, आम आदि की छटा नारंगी है।’ तभी जामुनी रंग ने कहा, ‘श्रेष्ठ तो मैं हूं क्योंकि मैं पानी की गहराई व मन की शांति का प्रतीक हूं।’ वर्षा ऋतु रंगों की इस सारी बहस को ध्यान से सुन रही थी। वह पास आकर बोली, ‘तुम सभी श्रेष्ठ हो। सभी को ईश्वर ने किसी न किसी खास कारण से बनाया है। लेकिन सर्वश्रेष्ठ है तुम सबका एक साथ होना। तभी आकाश में जोर से बिजली कड़की। सभी रंगों ने डर कर एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और आकाश में बड़ा-सा इंद्रधनुष दिखाई देने लगा। रंगों ने देखा, सभी उनकी छटा निहार रहे थे। इसके बाद रंगों ने कभी एक-दूसरे से झगड़ा नहीं किया।









No comments:

Post a Comment

बोधकथा (मूर्तिकार की साधना)

बोधकथा (मूर्तिकार की साधना) एक आदमी एक निर्माणाधीन मंदिर को देखने गया। तभी उसने देखा कि एक मूर्तिकार भगवान की एक जैसी दो मूर्ति बना रहा है।...