बोध कथा (परनिंदा)
स्वामी सेवानंदजी के दो शिष्य थे – रामानंद और चेतनानंद । एक दिन रामानंद देर तक सोया रहा । ऐसा 3 – 4 दिन तक होता रहा । आखिर चेतनानंद गुरुजी के पास पहुँचा और कहा - ‘‘गुरुदेव ! रामानंद आजकल देर तक सोता रहता है ।” गुरुजी बोले : ‘‘अच्छा होता अगर तू भी सोया ही रहता । चेतनानंद ने आश्चर्य से कहा - ‘‘ऐसा क्यों गुरुजी ? मेरे सोने से किसको लाभ होगा ? गुरु जी ने कहा - ‘‘तुमको ही लाभ होगा । तुम परनिंदा से बचे रहोगे ।” तब चेतनानंद ने तुरंत अपनी सफाई में कहा : ‘‘मैं निंदा नहीं कर रहा हूँ गुरुजी ! मैं तो उसकी गलती बता रहा हूँ जिससे वह सुधर जाय ! गुरुजी ने कहा – तुम उससे देर तक सोने का कारण पूछते। उसे समझाते । अगर वह फिर भी नहीं मानता तब यह बात उसके सामने मुझसे बोलनी चाहिए थी ।“ उसने गुरुदेव से हृदयपूर्वक क्षमा माँगी ।
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Monday, March 9, 2026
बोध कथा (कोयला और चंदन )
बोध कथा (कोयला और चंदन )
एक बार एक ऋषि ने अपने शिष्यों को एक महत्वपूर्ण बात का उपदेश दिया, जो उनके शिष्यों को जीवन में सबसे बड़ा संदेश लगा । एक बार ऋषि ने सभी शिष्यों को कहा कि एक कोयले का दुकड़ा और एक चंदन का टुकड़ा हाथ में पूरी रात रखो और सुबह मेरे पास आओ । सभी शिष्यों ने यह किया । जब सुबह को सभी शिष्य गुरु ऋषि के पास पहुचे तो ऋषि ने कहा अब ये सब टुकड़े कचरे के डिब्बे में फेक दो । शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया । पर गुरु ने जैसा कहा , वैसा उन्होने किया । अब गुरु ने कहा – अपने दोनों हाथ देखो जिस हाथ में कोयला रात भर था वो हाथ का पंजा काला हो गया है और जिस हाथ में चंदन था , उस हाथ का पंजा सुगंधित हो गया है । इसी तरह गलत संगति हमे दुख और बदनामी देती है और अच्छी संगति हमे ज्ञान, सुख और गुण देती है ।
बोध कथा (प्रतिभा की चमक)
बोध कथा (प्रतिभा की चमक)
ऋषि अंगिरा के शिष्यों में एक था उदयन। वह काफी प्रतिभाशाली था पर उसमें विनम्रता की कमी थी , ऋषि ने सोचा कि समय रहते इसे न समझाया गया तो वह लक्ष्य से भटक जाएगा। एक बार सर्दी की रात में सत्संग चल रहा था। बीच में अंगीठी में कोयले दहक रहे थे। ऋषि ने कहा, 'देखो वो सबसे बड़ा कोयला सबसे तेजस्वी है। इसे निकालकर मेरे पास रख दो’उदयन ने चिमटे से पकड़कर वह तेज भरा अंगारा ऋषि के पास रख दिया, लेकिन जल्दी ही उसकी चमक फीकी पड़ने लगी और वह तेजस्वी अंगारा काला कोयला भर रह गया। ऋषि ने समझाया, 'देखो, तुम चाहे जितने तेजस्वी हो, पर इस कोयले जैसी भूल मत कर बैठना। यह कोयला अंगीठी में सब के साथ रहता तो अंत तक तेजस्वी बना रहता और सबको गर्मी देता रहता, पर अब तो इसकी चमक नहीं रही। उदयन को अपनी भूल का अहसास हो गया।
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कीलों की बाड़
एक गाँव में एक बालक था। वह बहुत क्रोधी था। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाता और लोगों से कठोर शब्द बोल देता। उसके व्यवहार से घर वाले और मित्...