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Saturday, March 28, 2026

बोधकथा (मूर्तिकार की साधना)



बोधकथा (मूर्तिकार की साधना)

एक आदमी एक निर्माणाधीन मंदिर को देखने गया। तभी उसने देखा कि एक मूर्तिकार भगवान की एक जैसी दो मूर्ति बना रहा है। वह उसके पास गया और पूछा, “क्या तुम एक जैसी दो मूर्तियाँ बना रहे हो?” मूर्तिकार ने कहा, “नहीं।” “हमें एक ही मूर्ति चाहिए, पर पहली मूर्ति बनाते वक्त थोड़ी खराब हो गयी।” उस आदमी ने मूर्ति को उठाया और जांचने लगा। पर उसे कोई भी खराबी नजर नहीं आई। “कहाँ से खराब हो गयी है ये? यह कहाँ सामने लगने वाली है क्या?” मूर्तिकार ने कहा - “नहीं, ये तो मंदिर के बाहर 20 फीट ऊँचे खम्बे पर लगाने के लिए बनायी गयी हैं।” “अगर ये मूर्ति इतनी ऊपर लगने वाली है तो भला इतनी छोटी सी गलती को कोई कैसे देख लेगा? तुम तो पहले वाली मूर्ति को ही रख सकते हो। किसे पता पड़ेगा?” इस पर मूर्तिकार ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुरा कर कहा, “मुझे तो पता होगा ही और भगवान को भी पता होगा!”

Monday, March 9, 2026

बोध कथा (पेंसिल से सीख)

बोध कथा (पेंसिल से सीख)
पिता ने अपने लड़के से कहा – “मैं उम्मीद करता हूँ तुम भी बड़े होकर पेंसिल कि तरह ही बनोगे '
लड़के ने कहा – “ इसमे क्या खास है ? पिता बोले – “पेंसिल में पांच गुण हैं, जिसे अपना लो तो तुम महान बन जाओगे.' पहला : पेंसिल की तरह आपके भी पीछे एक हाथ होता है जो आपको मार्गदर्शन देता है और उस हाथ को हम ईश्वर कहते है। दूसरा: शार्पनर पेंसिल को थोड़ी देर के लिए तकलीफ पहुचाता है पर इसके बाद वो और ज्यादा अच्छा लिखती है. इसलिए तुम्हें भी दुःख और तकलीफों को सहना करना सीखना चाहिए । तीसरा: पेंसिल रबर द्वारा गलतियों को मिटाने का मौका देती है यानी गलतियाँ हो तो उसको सुधारना भी जरूरी है ।
चौथा: पेंसिल में उसकी लकड़ी से ज्यादा उसके अन्दर कि ग्रेफ़ाइट महत्वपूर्ण है, इसलिए तुम हमेशा ध्यान दो कि तुम्हारे अन्दर क्या भरा है? पांचवां: पेंसिल हमेशा निशान छोड़ जाती है, इसलिए तुम कोई भी काम चाहे वो कितना भी छोटा क्यों न हो बुद्धिमानी और एकाग्रता से करो, जिससे लोग तुम्हें याद रखें ।

बोध कथा (दीपों की बातें )

बोध कथा (दीपों की बातें )

एक बार की बात है, दीपावली की शाम थी । चार दीपक आपस में बात कर रहे थे। पहला दीपक बोला, 'मैं हमेशा बड़ा बनना चाहता था, सुंदर, आकर्षक और चिकना घड़ा बनना चाहता था पर क्या करूँ ज़रा-सा दिया बन गया।' दूसरा दीपक बोला, 'मैं भी अच्छी भव्य मूर्ति बन कर किसी अमीर के घर जाना चाहता था। उनके सुंदर, सुसज्जित आलीशान घर की शोभा बढ़ाना चाहता था। पर क्या करूँ मुझे कुम्हार ने छोटा-सा दिया बना दिया।' तीसरा दीपक बोला, 'मुझे बचपन से ही पैसों से बहुत प्यार है काश मैं गुल्लक बनता तो हर समय पैसों में रहता।' चौथा दीपक चुपचाप उनकी बातें सुन रहा था। अपनी बारी आने पर कहने लगा, 'एक राज़ की बात मैं आपको बताता हूँ, कुछ उद्देश्य रख कर आगे पूर्ण मेहनत से उसे हासिल करने के लिए प्रयास करना सही है लेकिन यदि हम असफल हुए तो भाग्य को कोसने में कहीं भी समझदारी नहीं हैं। यदि हम एक जगह असफल हो भी जाते हैं तो और द्वार खुलेंगे। जीवन में अवसरों की कमी नहीं हैं, एक गया तो आगे अनेक मिलेंगे। दीवाली में हमें पूजा घर में जगह मिलेगी, कितने घरों की हम शोभा बढ़ाएँगे। इसलिए दोस्तों, जहाँ भी रहो, जैसे भी रहो, हर हाल में खुश रहो ।

कीलों की बाड़

एक गाँव में एक बालक था। वह बहुत क्रोधी था। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाता और लोगों से कठोर शब्द बोल देता। उसके व्यवहार से घर वाले और मित्...