बोध कथा (स्वावलंबता )
बंगाल के एक छोटे से स्टेशन पर जब रेल रुकी तो एक युवक अपने छोटे से बक्से के लिए कुली को जोर-जोर से पुकार रहा था। तभी एक आदमी जो ये सब देख रहा था वह उसके पास चला आया । उस युवक ने उसको कुली समझकर पहले डांटा और फिर कहा की मेरा ये बक्सा उठाओ । उस आदमी ने बिना कुछ कहे सुने बक्सा उठाकर उस युवक के पीछे चल पड़ा । घर पहुचने पर, जब युवक ने पैसे देने चाहे तो तो वह आदमी बोला -'धन्यवाद मुझे पैसे नहीं चाहिए '
तभी घर में से उस युवक का बड़ा भाई निकला और उस आदमी को देखते ही आदर के साथ बोला -'नमस्कार विद्यासागर जी !' उस युवक के तो होश उड़ गए तुरंत उसने ईश्वरचंद विद्यासागर जी से माफ़ी मांगी । तब विद्यासागर जी बोले-'भाई ! अभिमान त्याग कर अपने हाथो से अपना काम स्वयं करो, मेरी यही इच्छा है, आगे से स्वावलंबी बनो , यही मेरा मेहनताना है . '
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