एक बार एक गुरु अपने शिष्य के साथ वन में भ्रमण कर रहे थे। चलते-चलते उनकी दृष्टि एक साधारण लकड़ी के टुकड़े पर पड़ी।
गुरु ने उसे उठाया और शिष्य से पूछा - इसकी क्या कीमत होगी?" शिष्य ने देखा और बोला - "गुरुदेव, यह तो एक साधारण लकड़ी का टुकड़ा है। शायद इसे जलाने के अलावा किसी काम में नहीं लिया जा सकता। इसकी कोई विशेष कीमत नहीं होगी।"
गुरु मुस्कुराए, कुछ बोले नहीं और उस लकड़ी को अपने साथ ले आए। अगले दिन वे उस लकड़ी को एक कुशल शिल्पकार के पास ले गए।
शिल्पकार ने उस लकड़ी को तराशा, काटा, घिसा और बड़ी लगन से उस पर नक्काशी की। कुछ दिनों बाद वही साधारण लकड़ी का टुकड़ा एक अत्यंत सुंदर मूर्ति बन गया । अब उस लकड़ी का मूल्य भी कई गुना बढ़ चुका था।
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बोधकथा (लकड़ी का मूल्य)
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